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दलित वोटरों को साधने में जुटी बीजेपी और कांग्रेस, उपचुनाव में निभाएंगे गेम चेंजर की भूमिका

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की जिन 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव (Assembly By-election) हो रहा है. उन सीटों पर इस बार जातिगत समीकरण (Cast Equation) भी अहम माने जा रहे हैं. इन सीटों के जातीय समीकरण पर गौर करें तो इन उपचुनावों में अनुसूचित जाति (Schedule Cast) के मतदाता गेम चेंजर (Game Changer) की भूमिका निभा सकते हैं. माना जा रहा है कि अनुसूचित जाति के मतदाता जिस पार्टी का समर्थन करेंगे. वह पार्टी जीत का स्वाद चख सकती है. इन्हीं समीकरणों को देखकर पहली बार मायावती की बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party Of Mayawati) भी 28 विधानसभा सीटों पर चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रही है..

BSP का कम हो रहा ग्राफ

हालांकि मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से सटे ग्वालियर चंबल (Gwalior Chambal) इलाके की 16 विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव में अनुसूचित जाति का मतदाता प्रभावी रहता है. खास बात यह है कि जिन 28 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं उनमें 26 सीटों में अनुसूचित जाति का मतदाता ऐसी स्थिति में है कि वह जिसको वोट कर देगा उस पार्टी का प्रभाव नतीजों पर पड़ेग.

ग्वालियर-चंबल में BSP पर भरोसा

खास बात यह है कि अनुसूचित जाति का वोटर ग्वालियर-चंबल में बसपा पर भरोसा जताता रहा है. बसपा यहां से लगातार चुनाव जीतती रही है. पिछले चुनाव में भी बसपा ने जो दो सीटे जीती थी. उनमें एक सीट चंबल अंचल की ही थी. जबकि कई सीटों पर पार्टी दूसरे और तीसरे स्थान पर रही थी.

कांग्रेस नेता भूपेंद्र गुप्ता (Congress Leader Bhupendra Gupta) कहते हैं कि 2018 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी कांग्रेस के खिलाफ लड़ी थी. लेकिन बीएसपी का जनाधार घट गया है. बीएसपी सैद्धांतिक रूप से इस बात का दावा करती थी कि वह उपचुनाव में हिस्सा नहीं लेती। लेकिन आज उपचुनाव में हिस्सा ले रही है, तो उसका प्रयोजन क्या है ये तो बीएसपी ही बताएगी. बीजेपी जिस तरह से वोट काटने के लिए कई संगठनों को फंडिंग कर रही है, उसी हिसाब से कई संगठन खड़े हो रहे हैं. लेकिन इससे कांग्रेस को नुकसान नहीं होगा क्योंकि जनता सब समझती है.

वही बीजेपी और बीएसपी की जुगलबंदी के कयासों को बीजेपी प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल (BJP Spoke Person Rajanish Agrawal) नकारते नजर आते हैं. वे कहते है कि बीजेपी अपने संगठन तंत्र के दम पर विकास के मंत्र के सहारे चुनाव के मैदान में हैं. एससी हो या एसटी या फिर ओबीसी और जनरल हर वर्ग बीजेपी को आशीर्वाद दे रहा है। पिछली बार कांग्रेस की काठ की हांडी चढ़ गई थी, इस बार समीकरण दूसरे हैं. सिंधिया के प्रभाव में कांग्रेस ने कुछ सीटें जीत ली थी लेकिन इस बार सिंधिया बीजेपी में अपने समर्थकों के साथ है, इसलिए स्वाभाविक है शिवराज सिंह की नीति जो दलित, शोषित, वंचित, पीड़ित के लिए लगातार कारगर है. उस पर बीजेपी को फिर जीत मिलेगी.
हालांकि जिस तरह से हाथरस कांड (Hathras Case) और बीजेपी के खिलाफ जो मुद्दे जा रहे हैं, उन सभी मुद्दों में मायावती मौन रही हैं. उससे लगता है कि बीजेपी और मायावती के बीच अंडरस्टैंडिंग चल रही है. लेकिन अनुसूचित जाति का मतदाता उस अंडरस्टैंडिंग को कितना समझेगा यह तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा

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